Friday, March 1, 2019

बताऊं क्या क्या

यूं ही बैठे बैठे अचानक कुछ ख्याल आए लगा जैसे कोई दिल के दरवाजे पर दस्तक देकर कह रहा हो "क्यों बेचैन हो, क्या हुआ है?  भारी है आज तो लिखो ना" और फिर ख़यालो में डूबे ये लिखा के 
'बताऊं क्या क्या'

कहना है के......

इस छोटे से दिल को समझाऊं क्या क्या
इतने सवालों के जवाब तुम्हें बताऊं क्या क्या

कभी महसूस कर लो खुद भी एहसासों को
चुप क्यों हैं जज्बात  तुम्हें बताऊं क्या क्या

ये इश्क़ भी ना बड़ा ही अजीबो - गरीब है यार 
कितना है आज़ाब ये तुम्हें बताऊं क्या क्या

लफ़्ज़ों में समझाना हो तो बहुत आसान होता
इन आंखो के इशारों से तुम्हें बताऊं क्या क्या

जानना हो के चीज़ है समंदर कितनी हसीन
कूदो, देखो, किनारों से तुम्हें बताऊं क्या क्या

खूबसूरत है रंग आसमानों का देखना उड़कर
यहां ज़मीन से बैठे बैठे तुम्हें बताऊं क्या क्या

मैं कितना अधूरा या मुकम्मल जानना है ना तुम्हें
पढ़ने की करो कोशिशें राज तुम्हें बताऊं क्या क्या

दूर से जो पूछोगे तो हाल अच्छा ही पाओगे "नवाब"
आओ नज़दीक, फासलों से तुम्हें बताऊं क्या क्या ।


अलग अलग एहसासों को इकट्ठा करके दिल के जज्बातों से होते हुए छोटी सी शिकायत पर ख़तम, इस कलाम के बारे में आपकी राय ज़रूर दीजिए। आपकी टिप्पणी बहुत मायने रखती है और नाचीज़ को हौंसला देती है ।
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1 comment:

। ढूंढता हूं । Dhoondta Hu।

लिखने  को मैं आज कोई उन्वान ढूंढता हूं कलम में अपनी खुदा का फैज़ान ढूंढता हूं। Likhne ko mai aaj koi unvaan dhoondta hu Kalam me apni khuda ...